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पाव भर कद्दू से बना लेती है रायता

रचनाकार: anjum
एक नदी की तरह सीख गई है घरेलू औरत दोनों हाथों में बर्तन थाम चौकें से बैठक तक लपकना जरा भी लड़खड़ाए बिना एक सांस में वह चढ़ जाती है सीढ़ियां और घुस जाती है लोकल में धक्का मुक्की की परवाह किए बिना राशन की कतार उसे कभी लम्बी नहीं लगी रिक्शा न मिले तो दोनों हाथों में झोले लटका वह पहुंच जाती है अपने घर एक भी बार पसीना पोंछे बिना एक कटोरी दही से तीन कटोरी रायता बना लेती है खांटी घरेलू औरत पाव भर कद्दू में घर भर को खिला लेती है जरा भी घबराए बिना! ~ ममता कालिया
12 09/22/2026

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