Rahulwoll
@rahul
राहुलवोल ने सह-संस्थापक के रूप में मृदुल के साथ अल्फ़ाज़-ए-नज़्म को शायरों के लिए एक सच्चा घर बनाने का सफ़र तय किया। वे भी शायरी के एक विनम्र विद्यार्थी हैं, जो हर शब्द में गहराई ढूँढ़ते हैं और हर नई ग़ज़ल में कुछ सीखने की कोशिश करते हैं। उनका मानना है कि हर शायर, चाहे वो नया हो या तजुर्बेकार, सुनने और सराहे जाने का हक़दार है — भाषा, शहर या पहचान चाहे जो भी हो। शायरों की मेहनत और उनकी कला के प्रति उनकी गहरी निष्ठा इस मंच को हर दिन आगे बढ़ाती है, और मंच की हर नई सुविधा के पीछे उनकी यही सोच काम करती है कि तकनीक शायरी की राह में कभी रुकावट नहीं, बल्कि एक सहारा बने।
ख़्वाबों को उड़ान दी तो पंख मिल गए जो सोचा था कभी, वो रंग मिल गए
सुबह की पहली किरण ने एक ख़त लिखा हर अंधेरे को रोशनी में बदलने का हक़ लिखा
हवा जो चली तो साथ ले गई कुछ बातें जो कहनी थीं तुझसे, अनकही रह गईं रातें
समंदर से पूछा मैंने तेरी गहराई का राज़ उसने कहा, ख़ामोश रहना ही है मेरा अंदाज़
दोस्ती किसी मज़हब की मोहताज नहीं ये दिल से दिल का रिश्ता है, आवाज़ नहीं
बारिश की हर बूँद में तेरा नाम था हर बादल के पीछे बस एक पैग़ाम था